Monday, 29 August 2011

 सर्द  रात में टपकती पानी की बुँदे . और मै अकेला दिए की रौशनी में बैठा ठिठुरते हुए लिख रहा हु . जानता  हु की कलम को भी ठण्ड लग रही हे किन्तु उसकी कागज के साथ जुगलबंदी सारी ठण्ड को अंगूठा दिखा देगी | छत से टपकती पानी की बुँदे थाली में गिरकर छन्न सी आवाज कर वातावरण को तरंगित कर रही है .

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